
सोच, संवेदना और सृजन


एकलव्य बॉक्स में कला आधारित ऐक्टिविटीज़ हैं,
जिन्हें कलाकसरत® कहा जाता है।
ये कलाकसरत बच्चों में खुद टटोलकर
और जाँचकर सीखने की गुंजाइश बनाती हैं।
इसके विचारपूर्वक गढ़े गए सीमित निर्देश बच्चों को
खोजबीन के ज़्यादा अवसर देते हैं।
जो कुछ वह बनाता है, वह उसके अपने ध्यान,
अपनी कल्पना और अपने धैर्य से रचा होता है।
इस प्रक्रिया में बच्चा नई चीज़ें आज़माना
और अपने फैसले खुद लेना सीखता है,
जो उसे धीरे-धीरे आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर बनाता है।





एकलव्य का औचित्य
आज बच्चों के पास जानकारी बहुत है। लेकिन जानकारी होना और समझ बनना, दोनों एक जैसी बात नहीं हैं।
आने वाले समय में बच्चे को केवल याद रखना काफी नहीं होगा।
उसे देखना होगा। समझना होगा। नया रास्ता निकालना होगा।
और कई बार बिना तैयार जवाब के आगे बढ़ना सीखना होगा।
इसीलिए आज ऐसे अभ्यास की ज़रूरत है जो बच्चे को भीतर से मजबूत करे। जो उसे केवल निर्देश मानने वाला न बनाए।
बल्कि देखने वाला, सोचने वाला और अपने बल पर कोशिश करने वाला बनाए।
हम चाहेंगे कि बच्चा बदलाव से न डरे, गलती से घबराए नहीं, अपनी कोशिश पर टीका रहे , अपने विचार पर भरोसा करे, धीरे-धीरे आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर बने।
यही एकलव्य का उद्देश्य है।
एकलव्य प्रज्ञा विकास मे भारतीय पारंपरिक ज्ञान
भारतीय पारंपरिक ज्ञान सीखने को केवल जानकारी पाने का माध्यम नहीं मानता।
यह जीवन को देखकर, अनुभव से समझकर और अपनी बुद्धि से परखकर आगे बढ़ने का मार्ग है।इसीलिए एकलव्य में सीखना केवल कुछ बना लेने तक सीमित नहीं है।
यह बच्चे को अन्वेषण की ओर ले जाता है - यानी खुद खोजने, पूछने, आज़माने और जांचने की ओर। यह कल्पना को जगह देता है - ताकि बच्चा केवल जो सामने है वही न देखे, बल्कि नया भी सोच सके। यह संबंध की समझ जगाता है - चीज़ों के बीच, अपने काम के भीतर, और अपने आसपास की दुनिया के साथ।यह संतुलन सिखाता है - ध्यान, धैर्य, भावना और क्रिया के बीच।
यह स्वतंत्र चिन्तन को मजबूत करता है - ताकि बच्चा केवल बताए हुए रास्ते पर न चले, बल्कि अपनी समझ से भी निर्णय ले सके।
जब बच्चा किसी कलाकसरत® में ध्यान लगाता है, फर्क पहचानता है, बार-बार कोशिश करता है, नई संभावना देखता है, और अपने निर्णय से आगे बढ़ता है, तब वह केवल कुछ बना नहीं रहा होता। वह अपने भीतर वही गुण गढ़ रहा होता है जो भारतीय पारंपरिक ज्ञान की जड़ों में हमेशा से महत्त्वपूर्ण रहे हैं। इसी तरह एकलव्य भारतीय पारंपरिक ज्ञान को आज के बच्चे के अनुभव, उसकी सोच और उसके सीखने की प्रक्रिया से जोड़ता है।

कला माध्यम की ताकद
कला बच्चे तक बहुत सहज
तरीके से पहुँचती है।
इस माध्यम मे डर कम होता है।
और खुलापन ज़्यादा होता है।
बच्चा जल्दी जुड़ता है।
जब बच्चा कला के माध्यम से कुछ करता है,
तब वह केवल रंग या आकार से नहीं खेल रहा होता।
वह देख रहा होता है।
तुलना कर रहा होता है।
चुनाव कर रहा होता है।
अधूरी चीज़ से आगे बढ़ रहा होता है।
ध्यान टिकाना सीख रहा होता है।

कला सोच को चलाती है।
वह बच्चे को अपने भीतर से
काम करने देती है।
वह सीखने को बोझ नहीं बनाती।
एकलव्य में कला किसी
अलग विषय की तरह नहीं आती।
वह सोचने का रास्ता
बनकर आती है।

एकलव्य की कलाकसरत® बच्चों में बुनियादी गुणों को मजबूत करता है। जैसे -
ध्यान - किसी चीज़ को ठहरकर देखना।जल्दीबाज़ी में आगे न बढ़ना।
जिज्ञासा - यह क्या है?ऐसा क्यों हुआ?और क्या हो सकता है?
निरीक्षण - छोटे-छोटे फर्क पहचानना। ध्यान से देखना। समझकर देखना।
कल्पना - जो सामने नहीं है, उसे भी सोच पाना। नई संभावना तक पहुँचना।
धैर्य - तुरंत हार न मानना।बार-बार कोशिश करना।
स्वतंत्र निर्णय - हर बार किसी और के जवाब पर निर्भर न रहना। अपनी समझ से चुनाव करना।
अपनी कोशिश से सीखना - कहने भर से नहीं।करके, टटोलकर और परखकर सीखना।
आत्मविश्वास - अपनी कोशिश को महत्व देना।धीरे-धीरे अपने विचार पर भरोसा करना।
आत्मनिर्भरता - हर छोटी बात में सहारे की ज़रूरत कम होना। अपने बल पर आगे बढ़ना।

एकलव्य में घर का बड़ा “हर बार समझाने वाला” नहीं है।
वह साथ देने वाला है। वह जगह देने वाला है। वह भरोसा देने वाला है।
हर बार सुधारना जरूरी नहीं। हर बार नमूना दिखाना जरूरी नहीं।
हर बार सही-गलत बताना भी जरूरी नहीं।
कई बार बच्चे को बस थोड़ा समय चाहिए। थोड़ी स्वतंत्रता चाहिए।
और यह भरोसा चाहिए कि उसकी अपनी कोशिश की कद्र है।
एकलव्य इसी भरोसे पर खड़ा है।